शनिवार, 26 मई 2012

इस कश्मीर को किसने लूटा


संविधान निर्माता बाबा साहब भीम राव आंबेडकर और संविधान की धारा  370 को लेकर आम जन में एक अलग राय है .जबकि ऐतिहासिक दस्ताबेज कुछ और बया करते हैं .मसलन बाबा साहब ने संविधान की रचना नहीं की थी और न ही भारतीय संविधान उनके मौलिक  कल्पना का लिखित दस्तावेज है .बाबा साहब संविधान सभा के प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे जबकि संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद थे .लेकिन बाबा साहब के अनुभव उनकी सूझ बुझ का संविधान सभा के हर सदस्य कायल थे .लेकिन वही प्रस्ताव संविधान का हिस्सा बना जिसपर बहुमत की राय थी .मसलन बाबा साहब जम्मू कश्मीर को धारा  370 का विशेष दर्जा देने के खिलाफ थे .लेकिन बाबा साहब के न चाहते हुए भी इसे शामिल किया गया .यह अलग बात है की संविधान में इसकी अस्थायी व्यवस्था दी गयी थी लेकिन यह धारा 370 जम्मू कश्मीर के पहचान बन गयी है .ठीक वैसे ही जैसे बाबा साहब ने सिर्फ 10 वर्षों के लिए आरक्षण की व्यवस्था दी थी आज यह आरक्षण  भारत के समाजी और राजनितिक जीवन का हिस्सा बन गया है .लेकिन समस्या आरक्षण को लेकर आज  भी बरकरार है. धारा 370 तो आजतक कश्मीरियों को मुख्यधारा में आने नहीं दिया और हर कश्मीरी यह समझकर इतराता रहा कि उसके पास असीम राजनितिक शक्ति है जो भारत के किसी और नागरिक को उपलब्ध नहीं है .

कश्मीर मसले की अनसुलझे पहेली को सुलझाने में हालिया रिपोर्ट ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है तीन सदस्यी वार्ताकारों की टीम  ने अलगाववादी को छोड़कर सबसे बात की है .2 साल में 700 से ज्यादा प्रतिनिधि मंडल से मुलाकात करके यह कमेटी इस निर्णय पर पहुची है कि  मसले के समाधान के लिए धारा 370 को  अस्थायी कहने के वजाय विशेष कहा जाय .फारूक अब्दुल्लाह की एन सी की मांग को मानते हुए कमिटी ने 1953 के बाद कश्मीर में लागू हुए तमाम केंद्रीय कानूनों की समीक्षा की बात  की है  दिलीप पाडगावकर की कमिटी यह लोगो को इस बात के लिए इजाजत दी है की अगर वे अपने राज्यपाल को उर्दू में सद्र या राष्ट्रपति कहे चीफ मिनिस्टर को वजीरे आज़म यानि प्रधानमंत्री कहे तो कोई दिक्कत नहीं है जबकि अंग्रेजी में इसे गवर्नर और चीफ मिनिस्टर ही माना जायेगा .176 पेज की रिपोर्ट में वार्ताकारो ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को हर जगह पाकिस्तान शासित कश्मीर बताया है .ध्यान रहे भारत की संसद पुरे जम्मू कश्मीर को देश का अभिन्न अंग मानती है जबकि पाकिस्तान हिस्से वाला कश्मीर को पाकिस्तान कब्जे वाला कश्मीर बताया गया है .वार्ताकार एम् एम् अंसारी कहते है " 1994 के संसद के रेजोलुशन और 1949 के संयुक्त राष्ट्र के रेजोलुशन इस दौर में अप्रभावी हो चुके है .कश्मीर का एक हिस्सा पाकिस्तान के पास में है कुछ पर चीन का कब्ज़ा है इस हालत में संसद का प्रस्ताव कहाँ तक प्रभावी हो सकता है ."ये अलग बात है की धारा  370 को प्रभावी बनाने के लिए वार्ताकारो ने काफी मशक्कत की है .

जम्मू कश्मीर देश का ऐसा एकलोता राज्य है जहा यह पता करना थोडा मुश्किल है सत्ता पक्ष या विपक्ष कौन कितने देर तक भारत के हिमायती है ..किसान  से लेकर सरकारी मुलाजिम को आर्थिक मदद या तनख्वाह देने के लिए राज्य सरकार को केंद्र से मदद की जरूरत है .पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्लाह कहते है "रियासत अपने संसाधन से अपने मुलाजिम को २ महीने की तनख्वाह भी नहीं दे सकती "लेकिन राज्य के आर्थिक विकास के लिए धारा ३७० को और अधिक प्रभावी बनाने की बात की जा रही है .बिहार ,उत्तर प्रदेश ,उड़ीसा,पश्चिम बंगाल जैसे पिछड़े राज्यों के तुलना में जम्मू कश्मीर को मिलने वाली केंद्रीय सहायता कई गुणा ज्यादा है .रियासत को प्रधानमंत्री के विशेष पकेज कई राज्यों के सालाना बजट से ज्यादा है. लेकिन यह राजनितिक ताकत आम आदमी को सुलभ नहीं है .रियासतको केंद्र की हर सुविधा का दरकार  है लेकिन सुविधा संपन्न लोगों  में टैक्स देने की रिवाज नहीं है .धारा 370 केंद्रीय कानूनों को रियासत में प्रभावी होने नहीं से रोकता है लेकिन यह किसी पॅकेज की मनाही नहीं करता लेकिन इसकी जाँच का अधिकार नहीं देता   .मुख्यमंत्री ओमर अब्दुल्लाह कहते है "पिछले वर्षों में वादी में नौजवानों ने इस  पकेज के लिए कुर्वनिया नहीं दी है ,कश्मीर का मसला राजनितिक है इसका आर्थिक सहयता से हल नहीं किया जा सकता ."ओमर अब्दुल्ला अपनी जगह बिलकुल सही फरमाते है वर्ना तीन साल से लगातार विवाद और अक्षम मुख्यमंत्री होने के वाबजूद ओ सरकार के मुखिया बने हुए है .करोडो रूपये के घोटाले के आरोप उनके मंत्री और अफसरों पर लगे है लेकिन कभी कोई करवाई नहीं हुई  .केंद्रीय मदद के अरबो रूपये का बंदरबाट पिछले कई वर्षो से जारी है लेकिन कभी किसी आरोपी पर कारवाई नहीं हुई .क्योंकि कश्मीर एक राजनितिक मसला है यहाँ आर्थिक घोटाले की तहकीकात की इजाज़त नहीं दी जा सकती .धारा ३७० यहाँ सियासी लीडरों के लिए कवच का काम करता है जिसमे वे कई कानूनी पहल से परे है .

इस कानूनी दायरे से मुख्यधारा की सियासत करने वाले ही नहीं  बल्कि अलगाववादी नेता भी  बाहर है .प्रमुख अलगाववादी नेता  गिलानी साहब पर करोडो रूपये के हवाला फंडिंग और टैक्स चोरी के इल्जाम लगे लेकिन गिलानी साहब को कभी भी इसके लिए किसी कोर्ट से बेल लेने की जरूरत नहीं पड़ी ,क्योंकि वो भारत के खिलाफ है .जाहिर है भारत के खिलाफ होना और बोलना कश्मीर की सियासत को खुल्लम खुल्ला लूट की इजाज़त देता है .विकीलिक्स के एक खुलासे में यह कहा गया की अलगाववादी  सियासत को जारी रखने के लिए पैसों की वरसात पाकिस्तान से भी हो रही  है और भारत से भी .यानी कश्मीर के कुछ चालाक सियासतदानो ने धारा 370 का इस्तेमाल करके करोडो अरबो बनाये लेकिन आम कश्मीरी आज भी एक छोटी सुविधा के लिए तरस रहा है . .हर सरकार के दौर में समस्या अगली सरकार के लिए छोड़ दी जाती है .भारत सरकार के वार्ताकारों की रिपोर्ट इसका जीता जगता उदाहरण है .आज कश्मीर में जो हालत बदले है उसकी कामयाबी का सेहरा हर कोई लेने के लिए अपने अपने तरीके से दलीले दे रहा है .यह जानते हुए की इन वर्षो में न केवल राजनितिक नेतृत्व बल्कि नौकरशाह इस मसले को लेकर पूरी तरह से असफल रहे है .मसले का समाधान किसी हाईपॉवर कमिटी से नहीं हो सकता .कश्मीर में आज नए चेहरे को सामने लाने की जरूरत है धरा 370 के पैदैस कभी भी इस सुविधा से अपने को अलग नहीं करेंगे जाहिर है समस्या बरक़रार रखने के लिए साजिशे होती रहेगी .आम आदमी को यह बताने की जरूरत  है कि इस धारा ने भारत को नहीं उन्हें ज्यादा लूटा है .

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

राईट टू एडुकेशन का मतलब निकालने में उलझा देश



सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले से उत्साहित मेरा बेटा सवाल पूछता है, क्या अब संस्कृति स्कूल में मेरा एड्मिसन हो पायेगा ? क्या डी पी एस में गरीब के बच्चे पढ़ पाएंगे ? अब मेरा सवाल है, क्यों देश के लाखों बच्चे ऊँचे दर्जे के प्राइवेट स्कूल में पढने को लालायित है ?क्यों ऊँचे दर्जे के स्कूल से निकलकर अधिकांश बच्चे ब्रांडेड  कंपनियों के बैग लेकर मार्केट में घुमने को मजबूर हैं .अवसर कम है तो प्रतियोगिता बढ़ेगी लेकिन जहाँ व्यवस्था में कुछ लोगों ने अपने लिए ऊँचे दर्जे का स्कूल हथिया लिया तो उसी व्यवस्था ने नौकरियों में आरक्षण के नाम पर प्रतिभाशाली बच्चो को बहार का रास्ता दिखा दिया .राईट टू एडुकेशन के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने एक रास्ता दिखाने की कोशिश की है .देश के तमाम निजी स्कूलों को अब अपने स्कूलों में २५ फिसद  गरीब बच्चों को जगह देनी होगी .ये बच्चे  अब रेगुलर क्लास में एड्मिसन के हक़दार होंगे .

अब  हर बच्चे को होगा शिक्षा का अधिकार ,यानी कोई भी माता पिता शासन से अपने एक से १४ साल के  बच्चो की पढाई लिखाई की व्यवस्था करने को कह सकता है . और यह  शासन की  जिम्मेदारी होगी कि उन बच्चो के लिए स्कूल की व्यवस्था कराये .शिक्षा बच्चों का मौलिक अधिकार है  ,यानि इस अधिकार को लागू करवाना सरकार की वाध्यता होगी.लेकिन सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने सुविधासंपन्न आ सुविधाहीन के बीच दुरी ख़तम करने की कोशिश की है .देश पर लगे आरक्षण के कलंक को धोने के लिए कोर्ट ने एक उपाय सुझाया है .महज १० साल के लिए लागु आरक्षण व्यवस्था क्यों देश की नियति बन गयी ?क्यों इन ६४ वर्षों में कुछ लोग ४ पीढ़ी से आरक्षण की मलाई खा रहे है जबकि सुदूर गाँव में हजारो पिछड़े परिवारों ने तरक्की की रौशनी नहीं देखी है .वजह यही स्कूल है .ग्रामीण इलाकों में  फर्जी सर्व शिक्षा अभियान   कागजों पर स्कूलों की भरमार  दिखा रहा है और हजारों बच्चों को शिक्षित करने का दावा करता है .यानी एक साजिश देश के ८५ फिसद बच्चों को प्राथमिक स्कूली शिक्षा के दौर में ही प्रतियोगिता से बाहर कर देती है .राईट टू एडुकेशन स्कूल में एडमिशन की पैरवी जरूर करता है लेकिन शिक्षा में एकरूपता के सवाल पर चुप है

इस समय तकरीबन 23 करोड़ बच्चे है जिसे प्राथमिक शिक्षा की जरूरत है .इसमें से ४ करोड़ से ज्यादा बच्चे शिक्षा की इस कड़ी को तोड़कर मजदूरी मे लगे हुए है .यानि ४ करोड़ से ज्यादा बाल मजदूर अपने और परिवार के भरण पोषण की जिम्मेदारी उठाये हुए है .लेकिन सरकार की यह जिद है कि इन तमाम बच्चो को स्कूल वापस लाये .यानी जिन परिवारों के रोजी रोटी का जरिया बाल मजदूर बन गए है उन्हें पहले भूख से आज़ादी दिलाये .लेकिन तमाम कड़े कानूनों के वाबजूद अगर बाल मजदूरी तेजी से फल -फूल रहे तो यह माना जायेगा की सरकार का यह क्रन्तिकारी फैसला भी एक दिन पानी मांगने लगेगा .नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ के सिर्फ चार जिलों ५० हजार से ज्यादा बच्चे स्कूल से दूर हैं .ये अलग बात है की सरकारी स्कूलों को श्री श्री रविशंकर नक्सालियों का ब्रीडिंग ग्रौंड मानते है .

एक अनुमान के मुताबिक शिक्षा के इस अधिकार की बात को जमीन पर उतरने के लिए सरकार को तकरीबन २ लाख करोड़ रूपये जुटाने होंगे .इस मद मे वित् आयोग ने २५००० करोड़ रूपये राज्यों को देने की बात की थी  ताकि इस कानून को सख्ती से लागु किया जा सके .लेकिन सवाल यह उठता है कि सरकार के पास स्कूल  नहीं है , .स्कूल है तो अध्यापक नहीं है फिर इस कानून का क्या होगा .जहाँ सरकारी स्कूल नहीं है तो क्या शिक्षा के अधिकार के जोर पर खेतान ,डीपीएस ,गोयनका ,जेविर्स ,टगोर जैसे नामी गिरामी स्कूल में बच्चों का एड्मिसन दिलाकर समस्या का समाधान निकला जा सकता है ..आज तमाम बड़े उद्योग पतियों के लिए स्कूल एक बड़ा कारोबार है .जिसके जरिये इनके  स्कूल शिक्षा नहीं, ख्वाब बेचते है .जहाँ माता पिता को यह आश्वस्त किया जाता है कि तुम पैसे दो बदले मे तुम्हारे  बच्चे को गाड़ी और बंगले वाली नौकरी मिलेगी शहरों में अल्प आमदनी के लोग भी अपने तनख्वाह का  आधी से अधिक हिस्सा अपने एक बच्चा पर खर्च करता है .इस उम्मीद से कि अंग्रेजी स्कूल से पढ़कर उनका बच्चा एक हैसियत वाली नौकरी जरूर पा लेगा .गरीब अभिवावक को  इस बात का एहसास है कि अंग्रेजी की ताक़त से बच्चा  सम्माननीय जिन्दगी जरूर जी लेगा .औसतन भारतीय के इसी सम्मानीय जिन्दगी की चाहत को प्राइवेट स्कूलों ने  कैश किया है .गाँव से लेकर शहरों तक तथाकथित अंग्रेजी स्कूलों की बाढ़ आ गयी लेकिन गरीब बच्चो के लिए स्कूल नहीं खुल सके .
मिड डे मील की सरकारी योजना ने ग्रामीण इलाके मे बच्चो को स्कूल आने के लिए प्रेरित किया लेकिन
केंद्र सरकार की स्कीम शिक्षा की गुणवत्ता की जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर छोड़ दी .
सवाल यह है कि देश का संविधान हर किसी के मौलिक अधिकार की रक्षा की पूरी गारंटी देता है .भारत के न्यायलय जागरूक पहरेदार की तरह इन अधिकारों की रक्षा के लिए तत्पर है तो क्या कल लोग अपने बच्चो के स्कूल दाखिले के लिए अदालत के दरवाजे खटखटाएंगे .क्या जो लोग भूख के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद नहीं कर पाए वे लोग अब अपने बच्चो के स्कूल के लिए आवाज उठाएंगे ? सुप्रीम कोर्ट गरीब बच्चो के लिए आरक्षण का निर्देश दिया है .लेकिन जहा सिर्फ २००० रूपये में गरीबी का प्रमाण पत्र लिया जा सकता है वहां असली गरीब का क्या होगा  .फिर इसका समाधान क्या हो ? इसका समाधान कभी रूस ने ढूंढा था ,वहां सभी बच्चे सरकारी स्कूलों मे पढ़ते है .वहां हर बच्चे का एक ही स्कूल ड्रेस है ,एक ही पाठ्यक्रम है .यानि प्रतिभा को उभारने का प्रयास हर को मिला हुआ है .सरकार अगर शिक्षा के अधिकार से सबको खुश करना चाहती है तो क्या  हर को समान अवसर की गारंटी देगी ?.क्या जिन बच्चो ने सरकारी स्कूलों मे तालीम ली है उसे कभी प्राइवेट स्कूलों के समक्ष खड़ा कर पायेगी? .शिक्षा मे आमूल चूल परिवर्तन लाने के कपिल सिब्बल के इरादे पर शंका नहीं जाहिर किया जा सकता लेकिन सिबल  साहब के साथ दिक्कत यह है कि उन्होंने शहरी चकाचोंध और प्राइवेट स्कूलों की शिक्षा देखी है ,उन्होंने उन हजारो बच्चो का दर्द नहीं देखा है जिन्होंने ४-५ कि मी दुरी रोज तय करके स्कूली शिक्षा पूरी की है ,जिन्होंने आधे पेट खाए अपनी पढाई जारी रखी. लेकिन इस पढाई के बाद भी अगर ये एक छोटी नौकरी लेने के लायक नहीं हो पाए तो इसमें उनका क्या दोष था ?.क्या इस व्यवस्था की खामियों को माननीय न्यायलय दूर कर पाएंगे क्या इस देश की शियासत अदालत के बताये रास्ते पर चलने को तैयार होगी ?


बुधवार, 7 मार्च 2012

आल इज वेल प्रधानमंत्री जी


उत्तर प्रदेश के एसेम्बली चुनाव में यह नारा खूब बजा "राहुल जी को लाना है देश को बचाना है ".कोंग्रेसी क्षत्रपों ने अपनी ओर से यह इशारा दे दिया था कि अगर उ प्र में कांग्रेस सत्ता में लौटती है तो राहुल जी देश की कमान संभल लेंगे .लेकिन सारे ख्वाब धरासायी हो गए .और तो और पांच राज्यों के चुनाव में सबसे ज्यादा दुर्गति कांग्रेस को ही झेलनी पड़ी .पंजाब तो मानो हाथ से निकल गयी तो उत्तराखंड ने  सत्ता के जोड़ -तोड़ में उलझा दिया .मणिपुर में हैट्रिक   कोई कामयाबी दर्ज नहीं करा पायी .गोवा में कांग्रेस को सत्ता से बाहर निकाल कर लोगों ने यह संकेत दे  दिया है कि आने वाले वक्त में देश में भ्रष्टाचार सबसे बड़ा मुद्दा होगा .
लेकिन कांग्रेस के खिलाफ उठे जन विरोध से बेखबर अपने प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन पूरी तरह से आश्वस्त है .नेहरु जी के बाद वे ऐसे पहले प्रधानमंत्री होंगे जिन्हें देश सेवा करने का सबसे ज्यादा मौका मिल रहा है .जाहिर है उनका "टीना" फैक्टर दिनों दिनों और मजबूत हो रहा है .टीना यानी देयर इज नो अल्टरनेटिव इस बात को मनमोहन सिंह बेहतर जानते है .यही वजह है कि अरबो रूपये के घोटाले सामने आने के वाबजूद कांग्रेस में सत्ता परिवर्तन की बात करने वाला कोई नहीं .एक उम्मीद कांग्रेस कार्यकर्ताओं में  राहुल गाँधी से दिखी थी हालिया  चुनाव नतीजो ने उन उम्मीदों पर पानी फेर दिया .यु पी चुनाव के दौरान केंद्रीय मंत्री श्री प्रकाश जसवाल कहते थे "राहुल जी जब चाहे प्रधानमंत्री बन सकते है , वो बारह बजे रात में भी  प्रधान मंत्री बनना चाहेंगे तब भी उनके लिए मुश्किलें नहीं आएँगी .फिर मुश्किल क्या है ?प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को करीब से जानने वाले कहते है "उन्हें अर्थशास्त्री के रूप में कुछ ज्यादा आका गया है जबकि राजनीतिज्ञ के रूप में उन्हें कम आँका गया है जबकि वे राजनीतिज्ञ ज्यादा और अर्थशास्त्री कम है " चुनावी दौरा में कम यकीन रखने वाले प्रधानमंत्री सिंह ने पंजाब और उत्तरप्रदेश में कुछ गिने चुने जगहों पर चुनावी भाषण दिया था लेकिन हर जगह उनके उम्मीदवार को हार का सामना करना पड़ा .यानी देश के आम वोटरों से उनका कोई कनेक्सन नहीं है फिर भी लगातार ७ साल से १.५ अरब की आवादी वाले मुल्क पर शासन कर रहे है .संसद और संसद से बाहर ,कोर्ट से लेकर सड़क पर लोग भले ही उनकी सरकार के खिलाफ सख्त टिपण्णी आती रही लेकिन कभी उन्होंने सफाई देने की जरूरत भी नहीं समझी .यानी प्रधानमंत्री जी को पता है  कांग्रेस के सामने जबतक ये मुश्किलें रहेगी तबतक आल इज वेल .

शनिवार, 28 जनवरी 2012

"आज़ादी का मतलब क्या" अब तक सीख नहीं पायी केंद्र सरकार

भारत सरकार  प्रायोजित हालिया सर्वे चौकाने वाले है .कश्मीरी नौजवानों के इर्द गिर्द घूमते हुए सवालो को लेकर कराये गए इस सर्वे में ५४ फिसद नौजवानों ने माना है की "आज़ादी " कश्मीर मसले का एकमात्र हल है . ९५ फिसद नौजवानों ने अपने को भारत के राजनितिक व्यवस्था से अलग माना है .सर्वे में ऐसे कई खुलासे है. जो बताते है कश्मीर का अधिकांश नौजवान देश की मुख्यधारा से जुड़ने के बजाय अपनी इस्लामिक पहचान को कायम दायम रखने के लिए प्रतिबद्ध है .तो क्या यह माना जाय यह गुस्सा नौजवानों का भारत के खिलाफ है या केंद्र सरकार की गलत नीतिया नौजवानों में भारत के प्रति नफरत बढाया है या फिर ओमर अब्दुल्लाह हुकूमत ने  नौजवानों को निराश किया है ?.
.पिछले महीने एक इंटरव्यू मे मुख्यमंत्री ओमर अब्दुल्लाह ने  माना था कि " सियासी तौर वे  कोई चमत्कार दिखाने के लायक नही है ना ही वे अपने आपको लोगों के बीच बेच पाए है ".यानि शेख अब्दुल्ला की तीसरी पीढ़ी को कांग्रेस की मरकजी सरकार ने  कश्मीर मे तुरुप के पत्ते की तरह इस्तेमाल करने की पूरी कोशिश की लेकिन यह दाव पूरी तरह से खाली गया .हालत यह है कि जो काम पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद नही कर सका .वादी मे सरगर्म अलगाववादी संगठन नही कर सके वह काम ओमर अब्दुल्ला अपने चंद वर्षों के शासन मे कर दिखाया. २००९ और २०१० में .कश्मीर वादी के दस जिले लगातार  महीनो  अस्तव्यस्त रहे .पुलिस और प्रदर्शनकारियों की झड़प ने  १०० से ज्यादा बच्चों  की जान ली  .वादी के कामकाज महीनो ठप्प रहे .लेकिन ओमर अब्दुल्लाह सरकार का कोई बाल बाका भी  नहीं कर सका .यह अवाम की चुनी सरकार थी लेकिन आवाम के गुस्से का इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला था ,ऐसा केंद्र सरकार का अस्वासन था .दरअसल नौजवानों  का  गुस्सा  ओमर अब्दुल्ला सरकार के खिलाफ था लेकिन बड़ी चालाकी से इस नाकामी के लिए केंद्र को जिम्मेदार ठहरा दिया गया .कहा गया कि राहुल गाँधी  ओमर अब्दुल्ला को हर हाल मे मुख्यमंत्री बने रहने की वकालत कर रहे है जाहिर है कश्मीर मे शांति बहाली के लिए गृह मंत्रालय को दुसरे आप्शन ढूंढने पड़े
.
कश्मीर भारत का अहम् हिस्सा है जाहिर है लोगों की मुश्किलों पर भी गौर करने की जरूरत है लेकिन अगर लोगों की शिकायत भ्रष्ट और अक्षम स्थानीय सरकार से है लेकिन बदले मे अगर श्रीनगर के सी आर पी ऍफ़ के बंकरों को हटाया जाय तो माना जायेगा कि केंद्र सरकार खुद समस्या से मुह चुरा रही है .गृह मंत्रालय के हालिया सर्वे में नौजवानों ने माना है की भ्रष्टाचार वादी के सबसे बड़ी समस्या है आम लोगों में भारत के खिलाफ गुस्से को बरक़रार रखने में इस भ्रष्टाचार का अहम् किरदार है .  पिछले वर्षों मे ६०० से ज्यादा नौकरशाह और राजनेताओं पर करोडो रूपये डकार लेने का आरोप सामने आये हैं ,लेकिन ओमर की  सरकार एक भी व्यक्ति परआजतक केस दर्ज नही कर सकी है .एक एक मंत्री के घरों के रंग रोगन पर करोडो अरबो खर्च किये जा चुके है लेकिन यह पूछने वाला नही है कि लोगों के पैसे की लूट पर यह सरकार चुप क्यों है ? खुद ओमर अब्दुल्लाह के तीन मंत्रियों पर दुबई और दुसरे शहरों में प्रोपर्टी बनाने का आरोप है .जाहिर है ओमर अब्दुल्ला अपनी हालत बेहतर समझते है सो भ्रष्टाचार और अक्षमता पर बोलने के बजाय उन्होंने मसले कश्मीर मे नयी  नयी सियासी पेंच डालने की कोशिश करते रहे  है .ओमर अब्दुल्ला को लगा कि पी ड़ी पी का सियासी आधार अलगाववाद है सो उन्होंने झट से यह कह दिया कि कश्मीर का भारत के साथ पूर्ण विलय अभी होना बाकी है यानि कश्मीर की जो हैसियत गिलानी साहब देखते है वही हैसियत ओमर अब्दुल्ला के लिए भी है लेकिन वे महत्वपूर्ण संवैधानिक पद पर कायम है .हाल के दिनों में उन्होंने अलगाववादियों से अफ्सफा का मुद्दा झटक लिया है .
 अरबी में एक कहावत काफी प्रचलित है कि जिसने ज्यादा दुनिया घूमा हो वह उतना ही ज्यादा झूठ बोलता है . ओमर अब्दुल्ला अपने खानदान की नाकामयाबी को छुपाने के लिए सीधे झूठ और भ्रम  का सहारा ले रहे है . उन्हें  यह याद दिलाने कि जरूरत है कि १९४८ में जब पाकिस्तानी फौज ने कश्मीर पर आक्रमण किया था तो कश्मीर के हजारों लोगों ने पाकिस्तानी गुरिल्लाओं को रोका था . सैकडो की तादाद में लोग शहीद हुए थे . बारामुल्ला में पाकिस्तानी फौज ने सैकडो बहनों की असमत्दरी की थी .भारत में कश्मीर विलय का एलान होने के साथ ही भारतीय फौज ने पाकिस्तानी आक्रमणकारियों को मार भगाया था . भारतीय फौज के स्वागत में लाखों की तदाद में जमा होकर कश्मीरियों ने भारत के प्रति अपने समर्थन का इजहार किया था . याद रखने वाली बात यह भी है कि वह शेख अबुल्लाह ही थे जिनके कहने पर पंडित नेहरु संयुक्त राष्ट्र गए और उन्होंने कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के हवाले कर दिया था ,जिसे हम पाकिस्तान मक्बूजा कश्मीर के नाम से जानते है . ओमर साहब को यह भी याद दिलाने की जरूरत है कि युसूफ शाह(सैयद शालाहुद्दीन ) १९८९ तक एक आम कश्मीरी एक आम भारतीय ही था . भारतीय लोकतंत्र में उसे गहरी आस्था थी और उसने एम् एल ए के लिए पर्चा भी भरा था . लोग कहते है कि युसूफ शाह की जीत पक्की थी . लेकिन फारूक अब्दुल्लाह ने उसके सपने पर पानी फेर दिया उसे एम् एल ए नहीं बनने दिया गया . युसूफ शाह सैयेद शालाहुद्दीन बन गया . वह हिजबुल मुजाहिदीन का कमांडर चीफ   बन बैठा . और जब कश्मीर में आतंकवाद का दौर शुरू हुआ तो फारूक अब्दुल्ला कश्मीर छोड़कर लन्दन भाग खड़े हुए . राजीव गांधी की भावुकता का नाजायज फायदा उठाकर फारूक अब्दुल्लाह १९९६ में ही दुबारा मुख्यमंत्री  बनकर लौटे .जम्हूरियत का जितना बलात्कार ओमर साहब के खानदानो ने  किया  शायद ऐसा नगा रक्स   भारत में कही हुआ हो . लेकिन कहा गया की कश्मीर के लोग भारत के वजाय पाकिस्तान जाना चाहते है..

पिछले  वर्षों में भारत सरकार ने  तीन  लाख  हजार करोड़ से ज्यादा खर्च कश्मीर मे  शायद इस भ्रम में किया है कि विकास की रफ़्तार के सामने में अलगाववाद की आवाज धीमी पड़ जायेगी । लेकिन ऐसा नही हुआ । पैसे की बौछार से कश्मीर में रियल स्टेट में बूम है । कस्बाई इलाके में भी शोपिंग मौल खुल गए हैं । लेकिन जब भी कोई आग भड़कती है तो वादी में जीवे जीवे पाकिस्तान की आवाज सबसे ज्यादा गूंजती है.... । क्या कभी हमने ये जानने की कोशिश कि क्या पैसा कश्मीर मसले का समाधान है ? भ्रष्टाचार के आकंठ मे  डुबे  कश्मीर के सियासतदान  कभी भी यह स्वीकार नही करते है कि लोगों का भरोसा उन्होंने खोया है बल्कि हर बार वे कश्मीर को एक अलग समस्या बताते हुए सारा ठीकरा केंद्र के सर फोड़ देता देता है  .कश्मीर के लोग पाकिस्तान की हालत से भली भाति वाकिफ है सो वह गिलानी साहब के कहने से पाकिस्तान नही चले जायेंगे .उन्हें यह भी पता है अगर जनमतसंग्रह हुए भी तो उन्हें भारत और पाकिस्तान मे से किसी एक को चुनना होगा .आज़ादी का तीसरा विकल्प नही है .उन्हें यह भी पता है कि जनमत संग्रह कराने के लिए पाकिस्तान को संयुक्त राष्ट्र की शर्तों को मानना होगा और उसे पाक अधिकृत कश्मीर से लेकर गिलगित बल्तिस्तान से अपने फौज हटाने होंगे और उन इलाकों को भारतीय फौज के हवाले करने होंगे .क्या पाकिस्तान कभी संयुक्त राष्ट्र की शर्तो को मानने के लिए तैयार होगा ?.क्या पाकिस्तान कभी भी इन इलाकों से पंजाब ,सिंध और पख्तून के लाखों लोगों को निकाल बाहर करेगा? .पाकिस्तान खुद संयुक्त राष्ट्र के पुराने प्रस्ताव को बीते दिनों की बात कह रहा है लेकिन कश्मीर मे अलगाववादी संयुक्त राष्ट्र की बात करते है .जाहिर है वे लोगों से झूठ बोल रहे है और उनका यह झूठ तबतक चलता रहेगा जबतक कश्मीर मे भ्रष्टाचार कायम रहेगा और राजगद्दी की वंश परंपरा चलती रहेगी.


याद कीजिये ओमर अब्दुल्ला का वह जोशीला भाषण । विश्वास प्रस्ताव पर संसद में महज दो मिनट के भाषण से वे मिडिया के हीरो बन गए थे ।अलगाववाद की भाषा बोलकर ओमर अब्दुल्ला  कश्मीर में नौजवानों के बीच अपनी पहचान बनाई थी . उन्हें लोगों ने हाथो हाथ लिया था । कांग्रेस के आलाकमान इस भाषण से इतने प्रभावित हुए थे कि जब बारी मुख्यमंत्री चुनने की आई तो उन्होंने सिर्फ़ ओमर अब्दुल्ला के लिए हामी भरी । लेकिन इस अब्दुल्ला ने जल्द ही सबको निराश किया ।
पिछले ६० वर्षों में भारत सरकार ने जितना तब्बजो कश्मीर को दिया है .उतना ध्यान शायद ही कोई राज्य आपनी ओर कर पाया हो । कश्मीर में इन वर्षों में जो माहौल बना है उसके लिए इस देश को भारी कुर्बानिया भी देनी पड़ी है । पैसे का हिसाब किताब आप भूल जाए । सबसे बड़ी बात यह कि कश्मीर में अमन पाने के लिए  २०००० से ज्यादा जवानों ने कुर्बानिया दी है , और जब अमन के इस माहोल को आगे ले चलाने की बात आती है तो  अब्दुल्ला उसी आर्मी को सियासी मोहरा बनाते है .गृह मंत्रालय के सर्वे में नौजवानों से कई सवाल पूछे गए लेकिन स्थानीय सरकार को लेकर ओमर अब्दुल्लाह को लेकर एक भी सवाल नहीं पूछे गए .जाहिर है अलगाववाद के नाम पर दुकान चलाने वालों ने केंद्र सरकार को एक और पेंच में फसा दिया है
कांग्रेस का समर्थन ओमर अब्दुल्ला को अगर इसलिए है कि वह राहूल के दोस्त है तो यह हमें नही भूलना चाहिए कि कभी इस देश ने पंडित नेहरू और शेख अब्दुल्ला की दोस्ती के कारण काफ़ी नुकशान सहा है । ये परेशानी आज तक पीछा नही छोड़ रही । अगर इसी दोस्ती के नाम पर यह सिलसिला जारी रहा तो कश्मीर में पाने के वजाय हम ज्यादा खोएंगे ।

शनिवार, 7 जनवरी 2012

सावधान आप उत्तर -प्रदेश में है !

जात न पूछो साधू से ,यानी सज्जन ,सुशील और विनम्र लोगों की कोई जात नहीं होती .लेकिन अपने उत्तर प्रदेश में जात न केवल सामाजिक पहचान से जुडी हुई है ,बल्कि यह व्यक्ति को सत्ता पर काबिज होने का अनोखा नुस्खा भी देती  है साथ ही समाज में दबंगई का प्रमाणपत्र भी .जीत हर कीमत के शर्त पर उत्तर प्रदेश में संघर्षरत बीजेपी को यह बात आखिर में समझ आई कि चौथे नंबर के लिए भी उसे जात समीकरण बनाने होंगे .भ्रष्टाचार और लोकपाल  के मुद्दे पर अलग -थलग पड़ी कांग्रेस से लोगों का मोहभंग होने लगा था और लोग बीजेपी को विकल्प मानने लगे थे .लेकिन उत्तर प्रदेश में बसपा के निष्कासित महारथियों को गले लगाकर पार्टी ने यह एहसास करा दिया है कि नैतिकता और सचरित्र  की बात बौधिक बहस की बात तो  हो सकती है लेकिन चुनाव जितने के कारगर उपाय नहीं हो सकते .यही वजह है कि उत्तर प्रदेश के चुनाव में पार्टी ने  चाल, चरित्र और चेहरा पूरी तरह से बदल लिया है .

सपा से निष्कासित सांसद राज बब्बर ने २००३ में यह नारा दिया था "जिस गाड़ी में सपा का झंडा ,उस गाडी में है मुलायम का गुंडा ".मायावती ने इसका विस्तार देते हुए पिछले चुनाव में नारा दिया "चढ़ गुंडों की छाती पर ,बटन दबेगा हाथी पर ".भय मुक्त समाज का ,सर्वजन समाज का नारा देकर मायावती प्रदेश की सत्ता पर काबिज हुई .लेकिन जातीय दबंगों का बोलबाला जारी रहा .शासन और सत्ता को ढाल बनाकर दबंगों ने अपना लूट -पाट जारी रखा .एकबार फिर उन्ही दबंगों और जातियों के समीकरण बैठकर हर पार्टी सत्ता की कुंजी अपने हाथ करने को उत्साहित है .
बसपा हो या सपा या फिर कांग्रेस को हर पार्टी को पता है कि बगैर ठोस मुद्दे के अपने बूते सरकार बनाना नामुमकिन है .यही वजह है कि मुलायम सिंह कांग्रेस से एक कदम दुरी रखकर वही सेकुलर राजनीती का दंभ भर रही है तो कांग्रेस के पास यह सेकुलर मुद्दा उसका कोपीराईट है . केंद्र में .कांग्रेस को पार्टी का समर्थन जारी रहेगा यह बात सपा के सर्वे सर्वा मुलायम सिंह कहरहे है .लेकिन पार्टी के दुसरे नंबर के शीर्ष नेता अखिलेश यादव हर सभा में राहुल को जमकर मजम्मत कर रहे है .उधर बसपा ने  भी केंद्र में कांग्रेस को अपना समर्थन जारी रखा है लेकिन उत्तर -प्रदेश में कांग्रेस को अपना दुश्मन नंबर वन बता रही है .यह हालत वी पी सिंह और बीजेपी के बीच गुप्त  चुनावी समझोता की याद दिलाती है .वी पी सिंह ने अपने को सेकुलर बताने के लिए बीजेपी को अपनी चुनावी सभावों से दूर रखा यहाँ तक की मथुरा के एक चुनावी मंच पर वी पी सिंह चढ़ने से इसलिए मना कर दिया था क्योंकि उस मंच पर कुछ झंडे बीजेपी के लगे थे .लेकिन पुरे प्रदेश में बीजेपी के साथ जनता दल का शीट शेयरिंग समझोते के तहत हुआ था .
यानी यह सेकुलर दिखने की कवायद उत्तर -प्रदेश में सिर्फ मुसलमानों के २० फिसद वोट को लेकर है .कांग्रेस हो या सपा या फिर बसपा अपने जातीय समीकरण को मुसलमान के साथ मिलाकर सत्ता पर काविज होने का आसन फ़ॉर्मूला ढूंढ़ती है .बिहार के नीतीश कुमार कुमार के फोर्मुले को अपनाकर राहुल गांधी की टीम ने पहले मायावती के दलित से महादलित को अलग करने की कोशिश की है .यानी १४ फिसद दलित वोट से मायावती के ८ फिसद जाटव को अलग थलग करने की कोशिश है .स्मरण हो कि इन्ही महादलितो के घर रात्रि विश्राम कर कंद मूल खाकर राहुल ने पिछले वर्षो में  शबुरी को उपकृत किया है आज पार्टी उनसे उसकी कीमत मांग रही है .पार्टी को यह पक्का यकीन है कि ६ फिसद महादलित ,८ फिसद अतिपिछडा,पिछड़ा मुस्लिम तबका  और बीजेपी से वापस आ चुके सवर्णों के वोट से पार्टी अपना १०-१२ फिसद वोट के कलंक को धो सकती है .जाहिर है अगर उत्तर -प्रदेश में पार्टी ने अपना वोट प्रतिशत बढ़ा लिया तो न केवल प्रदेश की सत्ता की चावी कांग्रेस के पास होगी बल्कि केंद्र के अगले चुनाव में उसकी बढ़त बरक़रार रहेगी .८७ रिजर्व सीट पर अपनी पुरानी दावेदारी वापस लाने के लिए राहुल ने पी एल पुनिया और अशोक तोमर को लगाया है तो बीजेपी और सपा से अलग हुई कुर्मी -लोध को अपने पाले में लाने के लिए अपने बूढ़े शेर वेणी प्रसाद को लगाया है .इसी अति पिछड़ा समूह को अपने पाले में लाने के लिए बीजेपी आज शिव का रूप धारण कर बाबू सिंह कुशवाहा और दुसरे दागी साबिक मंत्रियो का साथ ले रही है .

लेकिन सबसे दुखद पहलु इन चुनावो में अन्ना टीम और इंडिया अगेंस्ट करप्सन को हासिये पर चले जाना है .अन्ना बीमार है और उनकी टीम मायूसी में मर्सिया पढ़ रही है पांच राज्यों के .चुनावो में सक्रिय भूमिका निभाने का एलान करके आज अन्ना की टीम लोगों से सलाह मांग रही है तो यह मना जाएगा कि यह आन्दोलन अभी भी जनमानस के बीच अपना संपर्क नहीं बना पाया है .एक अन्ना के बीमार होने से अगर यह टीम आज सकते में  है तो  इसे  दूसरी सम्पूर्ण क्रांति क्रांति कहना बेमानी होगी .अन्ना की टीम यह भली भाति जानती है कि उत्तर -प्रदेश के जातीय दंगल में उनका जनलोकपाल चूं चू का मुरब्बा ही साबित होने वाला है .भ्रष्टाचारियो की जमात  जात का ढाल ओढ़कर अन्ना टीम के तमाम नारे को यहाँ निष्क्रिय कर सकती है .यही वजह है कि अन्ना से पहले किरण बेदी यह घोषणा कर रही है कि चुनाव प्रचार में उनकी कोई भूमिका नहीं होगी .सावधान आप उत्तर -प्रदेश में है !

शुक्रवार, 23 दिसम्बर 2011

संसद को त्याग कर ही बीजेपी सरकार बना सकती है

संसद और सड़क के बीच, सांसद और सिविल सोसाइटी के बीच ,बेईमान और इमानदार के बीच लोकपाल बिल को लेकर छिड़ी बहस अपने आखिरी पड़ाव पर है .देश की संसद का यह अनोखा बिल पिछले ४० साल में ११ बार नए संशोधन के साथ संसद में आया लेकिन हर बार राजनितिक इच्छाशक्ति के अभाव के  कारण यह बिल पास नहीं हो सका .वजह भ्रष्टाचार कभी देश के चुनावो का मुद्दा नहीं बना .वजह देश की राजनीती भ्रष्टाचार की संस्कृति को आत्मसात कर चुकी है .लेकिन इस वजह का श्रेय कमोवेश आमलोगों को भी जाता है .यह सवाल पूछा जाना लाजिमी है की पिछले २० वर्ष से सत्ता और राजनीती में अपना वर्चस्व रखने वाले लालू जी ,मुलायम सिंह ,रामविलास पासवान ,मायावती और देश के दर्जनों क्षेत्रीय पार्टिया क्या अपने उच्च आदर्शो के कारण बने हुए है या    इस आदर्श के पीछे उनकी दौलत है .देश के प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों का  भ्रष्टाचार से रिश्ता उतना ही पुराना है जितनी  पुरानी हमारी संसदीय व्यवस्था है .

लेकिन फिर भी यह भ्रष्टाचार कभी चनावी मुद्दा नहीं बन सका इसका जवाब मौजूदा लोकपाल बिल है .लोकपाल बिल में आज भ्रष्टाचार मुद्दा नहीं है बल्कि बड़ी चालाकी से सरकार ने बहस को आरक्षण के बहस में उलझा दिया है .सरकार यह बात बेहतर जानती है आरक्षण एक ऐसा तुरुप का पत्ता है जिसका इस्तेमाल न सिर्फ चुनाव जितने के लिए किया जा सकता है बल्कि समाज को विभिन्न धुर्वो में बांटा जा सकता है . ९ सदसीय लोकपाल में अनुभवी लोगों को शामिल करने के वजाय सरकार ने सदन के जरिये एक नयी बहस चलादी है कि लोकपाल में ओ बी सी के कितने प्रतिनिधि होंगे ,एस सी और एस टी के कितने लोग होंगे ,कितने मुसलमान होंगे ,कितने पंडित होंगे और कितने अनुभवी लोग .यानी इस देश की संसद भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए यह बहस करने के लिए तत्पर नहीं है कि देश के १० लाख करोड़ से ज्यादा कला धन कैसे वापस आये ?भ्रष्टाचार से त्रस्त आम लोगों को इससे कैसे मुक्ति दिलाये .? लेकिन अपनी प्रभुसत्ता के लिए व्याकुल सांसद यह बार बार दुहरा रहे है कि संसद सर्वोच्च है .

संसद की प्रमुख विपक्षी पार्टी बीजेपी अगर यह कहती है कि लोकपाल पर सरकार पहले मैच फिक्सिंग कर चुकी है .तो यह सवाल उनसे पूछा जाना लाजिमी है कि भ्रष्टाचार को अहम् मुद्दा बनाने में इस पार्टी का क्या योगदान है ?जन लोकपाल के जरिये अन्ना हजारे ने देश के लाखो -करोडो लोगों को जुवान दी है उन्हें यह एहसास कराया है कि देश के भ्रष्ट राजनेता और भ्रष्ट नौकरशाह का गठजोड़ तोड़े बगैर देश में सुशासन लाना नामुमकिन है .अन्ना का आमरण अनशन आज भी उनकी ताकत और पूंजी है और पहली बार उन्होंने हमारी संसदीय व्यवस्था को यह दिखा दिया है कि जन संसद आज भी संसद पर भारी है .संसद देश के १.५० अरब लोगों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करती है .लेकिन क्या इस देश की संसद को यह अधिकार है कि जनभावना को दरकिनार करके सिर्फ अपनी प्रभुसत्ता दिखाने के लिए अन्ना के आन्दोलन को मजाक साबित कर दे .आज लोकपाल बिल सरकार अफरा -तफरी में पास कराने में लगी हुई है इसकी वजह भी अन्ना का आन्दोलन ही है .प्रमुख विपक्षी पार्टी बीजेपी आज  मुद्दों के मामले में दिवालिया बना हुआ है .पार्टी सिर्फ विरोध कर रही है उसके पास लोगों को कहने के लिए कुछ नहीं है .अगर वह इस मुगालते में है कि अन्ना आन्दोलन की कमाई वह अकेले चुनाव में खर्च करेगी तो यह उसकी भूल है .अगर लोकपाल बिल को लेकर बीजेपी वाकई गंभीर है और भ्रष्टाचार से देश को मुक्ति दिलानी चाहती है तो इस मुद्दे पर उसे संसद से त्यागपत्र देकर सरकार के खिलाफ सड़क पर संघर्ष करना चाहिए .बीजेपी को यह मान लेनी चाहिए बगैर सड़क पर उतरे संसद पर उसका कब्ज़ा मुश्किल है .अन्ना ने रास्ता जरूर दिखा दिया है .....


मंगलवार, 6 दिसम्बर 2011

कपिल सिब्बल का फेसबुक प्रोफाइल

ऍफ़ डी आई के मामले में प्रधानमंत्री के सख्त रबैये से लोगों को यह एहसास हो गया था कि रिटेल सेक्टर में कोई बड़ा चमत्कार होने वाला है .देश के तमाम छोटे बड़े अख़बारों में ऍफ़ डी आई के फायदे को लेकर बड़ा इश्तिहार निकला गया .टीवी चैनलों पर आकर सरकार के मंत्रियों ने इसकी तारीफ में बड़ी बड़ी बातें की लेकिन  यह बात लोगों की समझ  में नहीं आई .यानी सरकार जिसे आर्थिक क्रांति मान रही थी लेगों ने उसे धोखा करार दिया .तो क्या लोग अखबार नहीं पढ़ते है ?टीवी नहीं देखते है ?या फिर सरकार सरकार पर कोई भरोसा नहीं है ?सरकार का यह फैसला इतना ही शानदार था तो इसे वापस क्यों लिया गया ? सोसल नेटवर्किंग साईट को लेकर कपिल सिब्बल के उग्र रूप से सरकार की हतासा समझी जा सकती है .टेलिकॉम मिनिस्टर श्री सिब्बल फेसबुक ,ट्वीटर और दुसरे साईट पर लगाम लगाना चाहते है .वजह लोग अख़बार या टीवी के प्रोपगंडा से उकता गए है अब ओ मौलिक सुचना का आदान प्रदान करना चाहते है.

सरकार का बहाना है कि इन साईट पर आपतिजनक मसाले डाले जा रहे है .लेकिन सवाल यह है कि सरकार के खिलाफ हर चीज आपतिजनक हो सकती है .फिर चीन और भारत में फर्क क्या है .कपिल सिब्बल जी वर्षों से जिस नागरिक अधिकार और स्वतंत्रता के लड़ाई( मोटी फीस लेकर ) अदालतों में लड़ते रहे है ,वही आज सरकारी चोंगा पहनकर इस आज़ादी को छिनना चाहते है .क्या वाकई में सरकार डरी हुई है ,मीडिया के नवप्रयोग से सहमी हुई है ?भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना का आन्दोलन सरकार के सुचना तंत्र को बेनकाव कर दिया है .अरब स्प्रिंग के जरिये पुरे मिडील इस्ट में मजबूत सत्ता को  सोकल नेटवर्किंग साईट ने धरासायी कर दिया है .तानाशाहों की लम्बी पारी को वहां के अखबारों ने नहीं बल्कि फेसबुक ने बोल्ड कर दिया था .वीकी लीक से आज पूरी दुनिया की सरकार आहात है .जाहिर है सरकार इस वेब दुनिया की ताक़त को पहचानती है .लेकिन सवाल यह है कि सुचना की इस ताकत को कमजोर करने के लिए सरकार क्यों बल प्रयोग करना चाहती है ?सुचना तंत्र पर सरकार का पूरा नियंत्रण है फिर वेब पर नियंत्रण को लेकर सरकार कंपनी के प्रवंधकों को क्यों धमका रही है .सोसिअल नेटवर्किंग साईट पर गलत सुचना पर नियंत्रण का पूरा अधिकार युजेर्स के पास है वो जब चाहे उसे ख़ारिज कर सकता है फिर सरकार की दखल की जरूरत क्यों पड़ी है ?१.५० अरब की आवादी वाले देश में आज भी महज 2 करोड़ लोग इन्टरनेट ने से जुड़ पाए है जबकि इस वेब दुनिया में साझीदार करने वालों की संख्या ५ -१० लाख से ज्यादा नहीं है .लेकिन फिर भी सरकार डरी हुई है .

आई टी के क्षेत्र में नव क्रांति ने लोगों को ज्यादा मुखर बना दिया है .सरकार मानती है कि सुचना क्रांति के इस युग में सत्ता को सामंती दायरे से बाहर निकलना होगा .इसी पहल में कांग्रेस अपने दुलारे राजकुमार को समाज के अंतिम व्यक्ति से संवाद करने के लिए प्रेरित किया है .लेकिन विडंबना यह है कि राहुल जी न तो उस दलित पिछड़े से संवाद बना प् रहे है न ही कांग्रेस और सरकार के मीडिया मनेजर आम लोगों से संवाद स्थापित कर पा रहा है .मेरे जैसा अदना सा आदमी अगर अपना फ्रेंड सर्किल २० हजार बना सकता है तो सरकार के लिए यह मुश्किल नहीं है कि अपने खिलाफ सुचना का प्रतिउत्तर देने के लिए कभी भी एक बड़ा नेटवर्क बना सकती है .लेकिन ऍफ़ डी आई के मामले में सरकार के  रवैये ने यह साफ़ कर दिया है कि उसने अपना आत्मविश्वास खो दिया है

शनिवार, 22 अक्तूबर 2011

धारा ३७० यानी भ्रष्टाचारियों का कवच

कश्मीर की  सियासत पर उम्दा विश्लेषण और सटीक टिपण्णी इस बार  आमलोगों ने की है .सितम्बर तक आनेवाले पर्यटकों की संख्या ११ लाख थी .वही इस दौर में माता वैष्णो देवी और बाबा अमरनाथ गुफा दर्शन के लिए ७५ लाख लोग रियासत पहुंचे .कश्मीर में अमन के लिए यह आमलोगों का शांति के लिए निवेश था .जाहिर है  आम हिन्दुस्तानियों का कश्मीर से यात्रा और पर्यटन के तालुक्कात ने धरा ३७० के असर को फीका किया है .राज्य के खजाने में सबसे ज्यादा राजस्व वैष्णो देवी श्रायण बोर्ड से मिलता है वही .दूर दराज के पहाड़ी इलाकों में बाबा अमरनाथ की यात्रा स्थानीय लोगों की जिन्दगी में उमंग भर देती है .यानी कश्मीर में लोगों की सरगर्मी बढ़ेगी तो अलगाववाद खुदबखुद दम तोड़ता नज़र आएगा .

जम्मू कश्मीर देश का ऐसा एकलोता राज्य है जहा यह पता करना थोडा मुश्किल है सत्ता पक्ष या विपक्ष कौन कितने देर तक भारत के हिमायती है ..कास्तकार से लेकर मुलाजिम को आर्थिक मदद या तनख्वाह देने के लिए राज्य सरकार को केंद्र से मदद की जरूरत है .पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्लाह कहते है "रियासत अपने संसाधन से अपने मुलाजिम को २ महीने की तनख्वाह भी नहीं दे सकती "लेकिन राज्य के आर्थिक विकास के लिए धारा ३७० को और अधिक प्रभावी बनाने की बात की जा रही है .बिहार ,उत्तर प्रदेश ,उड़ीसा,पश्चिम बंगाल जैसे पिछड़े राज्यों के तुलना में जम्मू कश्मीर को मिलने वाली केंद्रीय सहायता कई गुणा ज्यादा है .रियासत को प्रधानमंत्री के विशेष पकेज कई राज्यों के सालाना बजट से ज्यादा है. लेकिन फिर भी कश्मीर में अलगाववाद हावी है .मुख्यमंत्री ओमर अब्दुल्लाह कहते है "पिछले वर्षों में वादी में नौजवानों ने इस आर्थिक पकेज के लिए कुर्वनिया नहीं दी है ,कश्मीर का मसला राजनितिक है इसका आर्थिक सहयता से हल नहीं किया जा सकता ."ओमर अब्दुल्ला अपनी जगह बिलकुल सही फरमाते है वर्ना तीन साल से लगातार विवाद और अक्षम मुख्यमंत्री होने के वाबजूद ओ सरकार के मुखिया बने हुए है .करोडो रूपये के घोटाले के आरोप उनके मंत्री और अफसरों पर लगे है लेकिन कभी कोई करवाई नहीं .केंद्रीय मदद के अरबो रूपये का बंदरबाट पिछले कई वर्षो से जारी है लेकिन कभी किसी आरोपी पर कारवाई नहीं हुई .क्योंकि कश्मीर एक राजनितिक मसला है यहाँ आर्थिक घोटाले की तहकीकात की इजाज़त नहीं दी जा सकती .धारा ३७० यहाँ सियासी लीडरों के लिए कवच का काम करता है जिसमे वे कई कानूनी पहल से परे है .
इस कानूनी दायरे से मुख्यधारा की सियासत करने वाले ही नहीं बाहर है बल्कि अलगाववादी नेता इसे कश्मीर के अस्तित्व से जोड़ते है .प्रमुख अलगाववादी नेता  गिलानी साहब पर करोडो रूपये के हवाला फंडिंग और टैक्स चोरी के इल्जाम लगे लेकिन गिलानी साहब को कभी भी इसके लिए किसी कोर्ट से बेल लेने की जरूरत नहीं पड़ी ,क्योंकि वो भारत के खिलाफ है .जाहिर है भारत के खिलाफ होना और बोलना कश्मीर की सियासत को खुल्लम खुल्ला लूट की इजाज़त देता है .विकीलिक्स के एक खुलासे में यह कहा गया की अपनी अपनी सियासत को जारी रखने के लिए पैसों की वरसात पाकिस्तान से भी हो रहा है और भारत से भी .ये अलग बात है की बरसाती पानी के तरह बहते इस पानी को कौन अपने घर की ओर मोड़ लेता है .
पिछले साठ वर्षो में कश्मीर की सियासत का आधार सिर्फ टाइम पास रहा है .हर सरकार के दौर में समस्या अगली सरकार के लिए छोड़ दी जाती है .भारत सरकार के वार्ताकारों की रिपोर्ट इसका जीता जगता उदाहरण है .आज कश्मीर में जो हालत बदले है उसकी कामयाबी का सेहरा हर कोई लेने के लिए अपने अपने तरीके से दलीले दे रहा है .यह जानते हुए की इन वर्षो में न केवल राजनितिक नेतृत्व बल्कि नौकरशाह इस मसले को लेकर पूरी तरह से असफल रहे है .मसले का समाधान किसी हाईपॉवर कमिटी से नहीं हो सकता .मुल्क के आम आदमी की भूमिकाऔर  संवाद बढाकर इस मसले का हल किया जा सकता है


बृहस्पतिवार, 8 सितम्बर 2011

आतंकवाद के खिलाफ हमें चाहिए एक और अन्ना

                                 धमाके जारी  हैं ..बहस जारी है ...पिछले सात साल में २७ धमाके ..सैकड़ो लोगों की मौत ..हजारों घायल लेकिन जनता खामोश है .. मनमोहन सिंह सरकार के वरिष्ठ मंत्री सुबोध कान्त सहाय  कहते है "लोग अब इन धमाकों के आदी हो चुके हैं.."शायद ये बोम्ब धमाके रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गए है. दिल्ली हाईकोर्ट धमाके में १२ लोगों की जान गयी और ७० लोग जख्मी हुए .लेकिन इससे पहले भी कई धमाके हुए हैं और नतीजा कुछ भी हाथ नहीं आया .२४ घंटे के खबरिया चैनेल को खबर चाहिए , सरकार की ओर से खबर नहीं मिलेगी तो चैनेल अपने तरीके से खबरों का विश्लेषण करेंगे जाहिर है सरकार मीडिया मनेजमेंट हर समय कुछ न कुछ स्कूप जरूर मुहैया करेगी .ये खबरों का खेल है इसे खेलना सरकार बखूबी जानती है. मनमोहन सिंह की पहली पारी में अलग अलग धमाकों में ४ हजार से ज्यादा लोग मारे गए फिर भी अगले चुनाव में मनमोहन सिंह न केबल सत्ता में दुबारा लौटे बल्कि यह भी साबित कर दिया कि इस देश में आतंकवाद कभी चुनावी मुद्दा नहीं हो सकता और अगर यह  कभी मुद्दा नहीं हो सकता तो सरकार की गंभीरता पर सवाल उठाना और ठोस करवाई की उम्मीद करने का हक कम से कम लोगों ने खो दिया है.
                                                                                   लगातार हो रहे ब्लास्ट से आहत पत्रकार अमित कुमार कहते है"सरकार और देश के राजनेता यह तय नहीं कर पा रहे है कि वह किसके साथ जाय  सरकार के प्रधानमंत्री आतंकवाद से लड़ने का हर बार अज्म दोहराते है .उसी सरकार के एक बड़े नेता आतंक में लिप्त लोगों के लिए जोर शोर से वकालत करते है.लेकिन फिर भी हम अवोध बालक की तरह कुछ ठोस करवाई चाहते है " २६\११ के मुंबई हमले में स्थानीय स्लीपंग सेल की भूमिका को पूरी तरह से नकार दिया गया क्योंकि जांच खास समुदाय के गुमराह लोगों की ओर जा रही थी .क्योंकि ये सियासत का मामला है इसलिए जांच एजेंसी को समझौता करना पड़ा. लेकिन उसी मुंबई में दुबारा धमाके हुए २६ लोग मारे गए  लेकिन पुलिस के हाथ कुछ नहीं लगा क्योंकि इन धमाको में एक बार फिर पुलिस ने एक बार फिर बड़ा खुलासा सामने लाया "पाकिस्तान और आई एस आई के इशारे पर धमाके हुए "लेकिन किसने इस धमाके को अंजाम दिया ?कौन लोग इन धमाको में शामिल थे इसे ढूंढ़ पाने में गृह मंत्री चिदम्बरम के एन आई ए और काउंटर टेर्रोरिस्म सेंटर के तमाम विश्लेषण फेल साबित हुए.
                                                                             शिवराज पाटिल के बाद गृह मंत्री की भूमिका में आये पी चिदम्बरम से देश ने कुछ ज्यादा उम्मीद बाँध ली इसमें चिदम्बरम का क्या कशुर था .चिदम्बरम उसी मनमोहन सिंह सरकार के गृह मंत्री है जो कभी शिवराज पाटिल हुआ करते थे.फर्क सिर्फ इतना है चिदम्बरम अंग्रेजी बोलते है और प्रोफेसनल दिखते है.लेकिन पाटिल जी ने यह पहले साफ कर दिया था कि वे गृह मंत्री किसी काबिलियत के कारण नहीं बने है बल्कि ये सोनिया जी की कृपा है.यही बात कमोवेश प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में भी कही जाती है.यानी सरकार और पार्टी  कौन चला रहे है?इस व्यवस्था पर नारायणमूर्ति सवाल उठा चुके है . आतंकवाद से लड़ने के तमाम इरादे क्यों असफल रहे इसका जवाब खुद मनमोहन सिंह के पास भी नहीं है.                          
   लेकिन इसका जवाब किसी राजनेता के पास भी  नहीं है.दिल्ली बम धमाके  के महज चंद घंटे के बाद संसद में चर्चा में भाग लेते हुए मुलायम सिंह ने सरकार को चेताया कि जाँच में किसी खास समुदाय के लोगों की धड्पकड़  रोकनी होगी .यानी मुलायम धमाके में पीड़ित लोगों के सांत्वना के दो शब्द में भी अपने वोट बैंक को नहीं भूलते .इस हालत में वोट बैंक को लेकर सियासत करने वाली कांग्रेस से ज्यादा उम्मीद करना बैमानी होगी. बीजेपी की हालत यह है कि आतंकवाद पर बोलते ही पहला निशाना उसका मुसलमान होता है. बीजेपी जिस दिन आतंकवाद के मुद्दे पर  मुसलमानों का भरोसा जीत लेगी उस दिन यह पार्टी देश में सबसे बड़ा जनाधार वाली पार्टी होगी लेकिन वह ऐसा कर नहीं पाएगी . भ्रष्टाचार को देश की संस्कृति मानने वाले लोगों को अन्ना हजारे का आन्दोलन ने गलत साबित  किया है और इसे पुरे देश में एक मुद्दा बना दिया है.आतंकवाद के खिलाफ देश को जगाने के लिए एक और अन्ना की दरकार है.




शुक्रवार, 24 जून 2011

यह सियासी ड्रामा किसके लिए है

भारत पाकिस्तान के रिश्ते पर जमे बर्फ को पिघलाने की कोशिश एक बार फिर तेज हुई है .मुंबई हमले के बाद ठप्प पड़े बातचीत की पहल को मजबूती दी जा रही है .कश्मीर से लेकर आतंकवाद तक सारे मुद्दे पर खुलकर बहस हो रही है .लेकिन यहाँ यह सवाल उठाना लाजिमी है कि कौन है ये लोग जो भारत पाकिस्तान के बीच जटिल मसले को चुटकी बजा कर हल करना चाहते है .पाकिस्तान के मोहम्मद अकरम कहते है "नेहरु गए ,जिन्ना गए ,इंदिरा गयी ,बेनजीर गयी ,वाजपेयी साहब आये लेकिन मसला वही का वही है ,क्या पाकिस्तान के यही अफलातून इस मुद्दे को सुलझाएंगे ,जिनपर अवाम का एतमाद नहीं है .हुकूमत यहाँ कौन चला रहा है यह पाकिस्तानी अवाम को भी नहीं मालूम है क्या इंडिया को नहीं पता कि वजीरे आजम युसूफ रजा गिलानी की यहाँ क्या हैसियत  है ."

भारत को पाकिस्तानी हुकुमरानो की भले ही हैसियत पता नहीं हो लेकिन अमेरिका को उनकी हैसियत मालूम है ,सो पाकिस्तान को भरोसा में लिए बगैर अमेरिका ने दुनिया के सबसे खतरनाक दहशतगर्द ओसामा बिन लादेन को मार डाला .पाकिस्तानी फौज के सुरक्षित पनाहगाह में घुसकर अमेरिका की यह करवाई इस सच को दुनिया के सामने ला दिया था कि पाकिस्तान एक बिखरा हुआ मुल्क है जिसे अलग पॉवर सेंटर ने अपने बीच बाट लिया है .वहां कहने के लिए अवाम की चुनी हुई सरकार है जिसका मुखिया गिलानी है ,वहा संवैधानिक सत्ता के मुखिया सद्र जरदारी है .लेकिन फौज वहां आर्मी ऑफ़ द पीपुल है तो आई एस आई को स्टेट विदीन स्टेट का दर्जा हासिल है .सचिव स्तर के मौसेदे में आतंकवाद ,सियाचिन ,सिर्क्रिक जैसे मुद्दे पहले से तय थे लेकिन पाकिस्तानी फौज को खुश करने के लिए इस चर्चा में कश्मीर को भी जोड़ा गया .यानी पाकिस्तानी फौज मसले कश्मीर पर अपने को सबसे बड़ा पैरोकार मानती है .आवामी मसले और सियासी मसले से उनका कोई सरोकार नहीं है जाहिर है उनकी रूचि सिर्फ कश्मीर में है .एक गरीब मुल्क के १९ फिसद बजट को वहां की फौज चट कर जाती है सिर्फ इसलिए कि वह पाकिस्तान के अवाम को यह बताने में कामयाब रही है कि पाकिस्तान को सबसे बड़ा खतरा भारत से है और इस खतरे से निपटने की पूरी गारंटी सिर्फ पाकिस्तानी फौज ही दे सकती है .६4 साल के पाकिस्तान में लगभग ४८ साल तक वहां की फौज ने हुकूमत की बागडोर अपने हाथ में रखी है .इस दौर में जेनरल कियानी ने तीन साल का एक्सटेंसन लेकर एक तरह से वहां साइलेंट कूप का ही संकेत दिया है .
ब्लीडिंग इंडिया बाय थोसेंड्स कट्स की पालिसी पर पाकिस्तान आज भी कायम है ,क्योंकि उसे पता है कि मुंबई हमले होने के बाद भी आज न कल भारत एकबार फिर बातचीत की पहल करेगा .पिछले २० वर्षों में हमने विभिन्न आतंकवादी हमले में १.५० लाख से ज्यादा लोगों को खोया है लेकिन हर बार बातचीत की पहल में आगे बढ़कर दोस्ती का हाथ बढ़ाते है .पाकिस्तानी फौज ,आई एस आई और आतंकवादी संगठन को लेकर हमने दुनिया भर में चर्चा की है लेकिन आजतक किसी ने हमारी चिंता पर कोई पहल नहीं की है .अमेरिका खुद अफगानिस्तान में फसा हुआ है तो उसे इसकी कुंजी आई एस आई और फौज के हाथ मिलती है .अमेरिका आज कियानी और पासा से सीधा संवाद बना रहा है .मुंबई हमले के आरोपी हेडली और राणा के खुलासे के बावजूद अमेरिका आई एस आई ऑफिसर मेज इकबाल और दुसरे फौजी ऑफिसर को बचाने में लगा है .अमेरिका यह जनता है कि उससे अरबो डालर लेकर भी पाकिस्तानी फौज गद्दारी कर रही है लेकिन फिर भी अमेरिका फौज से अपना संवाद तोड़ नहीं सका है .लेकिन हम अमेरिका से यह उम्मीद करते है कि हमारी पैरवी वह पाकिस्तानी फौज से करे .
संसद पर हमले के बावजूद वाजपेयी ने जनरल मुशरफ  से बातचीत की पहल की थी .दुनिया ने उन्हें दशक का सबसे काबिल राजनीतिज्ञ मना था .वाजपेयी के राजनैयिक प्रतिभा को पाकिस्तानी अवाम ने खास तौर से सराहा था .वाजपेयी जंग नहीं चाहते थे ,जंग शायद पाकिस्तानी अवाम  भी नहीं चाहते . मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जंग जैसी फालतू चीजो से परहेज करते हुए पाकिस्तान की इकोनोमी में अपना सहयोग देना चाहते है  .उनका दर्शन है आर्थिक रूप से मजबूत पाकिस्तान भारत के पक्ष में है .आज पाकिस्तान की जी  डी पी में सबसे ज्यादा योगदान विदेशी मुल्कों का ही है .जो उसे आतंकवाद के खिलाफ जंग के नाम पर मिल रहा है .इस हालत में क्या हम पाकिस्तान से यह उम्मीद करसकते  है कि वह आतंकवाद से मुहं मोड़ लेगा .क्या हम वहां की हुकूमत से यह उम्मीद कर सकते है कि उसकी फौज और आई एस आई दूसरा मुंबई जैसे हमले नहीं कराएगी .अगर पाकिस्तान की हुकूमत ऐसी कोई गारंटी नहीं दे सकती है तो सलमान बशीर और निरुपमा राव की बातचीत से बेहतर है जनरल बी के सिंह और जनरल कियानी के बीच ही सीधी बात हो .


बुधवार, 1 जून 2011

संसद पर एन जी ओ भारी

२४ घंटे के खबरिया चैनल में सिर्फ बाबा रामदेव .अंग्रेजी सहित दूसरी भारतीय भाषा के अख़बारों में सिर्फ बाबा  रामदेव .यानी खबरों का सरोकार इनदिनों बाबा रामदेव से है जो १अरब १२ करोड़ जनता की सरकार को धमका रहे है .केंद्र की हर दिल अजीज और लोकप्रिय यु पी ए  सरकार जिसे दुबारा सत्ता में आने का मौका देश की जनता ने दिया वह एक अदना सा बाबा के सामने गिरगिरा रही है .बाबा रामदेव भ्रष्टाचार और कालाधन के खिलाफ राजधानी दिल्ली में  आमरण अनशन करने वाले है लेकिन नींद सरकार की उडी हुई है .नेहरु जी और इंदिरा जी के बाद मनमोहन सिंह तीसरे कांग्रेसी प्रधानमंत्री है जिन्होंने देश पर ७ साल से अधिक राज किया है लेकिन एक अदना सा बाबा जिसकी बाजीगरी सांस तेज खीचने में है उसने प्रधानमंत्री की साँसे  अटका दी है .प्रधानमंत्री बाबा को मनाने के लिये चिठ्ठी लिख रहे है .आयकर विभाग से लेकर इ डी के आला अधिकारी कालाधन और आयकर चोरी का रहस्य और सरकार की मजबूरी से बाबा को अवगत करा रहे है .लेकिन बाबा तो बाबा है टी वी के जरिये पूरी दुनिया को अबतक योग रहस्य बताते रहे है अब उसी टीवी के जरिये वो  लोगों को कालाधन का रहस्य बताने सामने आये है लेकिन सरकार उन्हें यह मौका  नहीं देना चाहती है सो बाबा की दिल्ली एअरपोर्ट पर आने की खबर सुनते ही सरकार के आलामंत्री और संकटमोचक प्रणव मुखर्जी बाबा को घेरने एअरपोर्ट पहुँच गए .जो सरकार आम लोगो से बात करने के लिए तैयार नहीं है ,जो सरकार महगाई जैसी अहम् समस्या पर जनता की मांग को अबतक दरकिनार करती रही है वही सरकार बाबा से बात करने दौर लगा रही है .ये बाबा का रहस्य है या कलाधन का लेकिन जंतर मंतर का खोफ सरकार पर आज भी सर चढ़ कर बोल रहा है .
भ्रष्टाचार के दल दल में फसे एक तथाकथित इमानदार प्रधानमंत्री की ये हालत किसने की है .माननीय अदालतों ने ,देश के बुद्धिजीवियों ने या फिर एन जी ओ ने ?जाहिर है पहले सोनिया जी का एन जी ओ राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् ने सरकार का कद छोटा किया तो दुसरे एन जी ओ वाले ने सरकार और संसद के अस्तित्व पर ही सवालिया निशान लगा दिया .पेट्रोल प्राइस की बात हो या सब्सिडी की या फिर लोकपाल बिल की बात हो या फ़ूड सिक्यूरिटी की या फिर सांप्रदायिक दंगा विरोधी बिल राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् के विद्वान सदस्य अपना वीटो पेश करके मंत्रीपरिषद् के निर्णयों को प्रभावित करते है .जाहिर है यह सोनिया जी का एन जी ओ है सो सरकार इसे लगभग सरकारी मसौदा मान लेती है .लेकिन अन्ना हजारे और अरविद केजरीवाल का एन जी ओ जब लोकपाल बिल पर अपना सुझाव सामने लाता है तो इसे पहले दरकिनार करने की कोशिश की जाती है .लेकिन पहलीबार देश के विभिन्न एन जी ओ ने दिखाया है कि वह सरकारी एन जी ओ पर भरी है क्योंकि सरकार से लोगों का भरोसा उठ चूका है ..राजधानी दिल्ली स्थित जंतर मंतर महज दो दिनों के अंदर तहरीर चौक का रूप ले लेगा, ऐसा अंदाजा न तो सरकार को था न ही आन्दोलनकारी को ऐसा यकीन था .  अन्ना हजारे का आमरण अनसन महज ५२  घंटे में राष्ट्रव्यापी आन्दोलन बन गया .हर शहर के चौक चौराहे पर भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों की उमड़ी भीड़ सरकार को यह बता रही थी ,कि सब्र का पैमाना अब टूट चूका है .
गांधी के इस देश में आम लोगों का सरोकार सरकार से कितना है इसे इस सन्दर्भ में समझा जा सकता है .केंद्रीय बजट के रूप में सरकार हर साल ११-१२ लाख करोड़ रूपये का लेखा -जोखा प्रस्तुत करती है .मुल्क की प्रान्तों की सरकार भी हर साल २३-२५ लाख करोड़ रूपये खर्च करती है .यानी जिस देश में सरकारें ३५-३७ लाख करोड़ रुपया खर्च करती हो और वहां की ७० फीषद आवादी की आमदनी २० रुपया हो तो यह माना जा सकता है कि मुल्क के राजनेताओ और नौकरशाहो ने दलालों के जरिये आम लोगों के हिस्से को लूट लिया है .बाबा रामदेव आज यही बात लोगों को समझाने में कामयाब हुए है कि लूट के पैसे सरकार वापस लाती है तो यह मुल्क इंग्लॅण्ड और अमेरिका को भी पीछे छोड़ सकता है .बाबा रामदेव न तो कोई अर्थशास्त्री है न ही कभी जाँच एजेंसी से उनका सरोकार रहा है लेकिन वो दावा करते है कि सरकार उनकी बात माने तो वेदेशो में रखे ५०० खरब रुपया भारत वापस लाया जा सकता है .सरकार की मजबूरी यह है कि वह रोज सुप्रीम कोर्ट में कालाधन के मामले में फटकार सुन रही है लेकिन सूचि को सार्वजानिक करने को तैयार नहीं है .बाबा रामदेव सरकार की कमजोरी जान चुके है .लेकिन बाबा को पता है दवाब में आकर सरकार ने पहले अन्ना हजारे को संसद से भी महान बना दिया लेकिन आज सरकार के मंत्री उन्हें धमका रहे है .बाबा रामदेव यह भी जानते है कि कल तक सरकार दिग्विजय सिंह को अनाप सनाप बयान देने के लिए खुल्ला छोड़ दिया था .दिग्विजय सिंह हर मंच से बाबा को ललकार रहे थे लेकिन आज देश के प्रधानमंत्री उन्हें खुद पुचकार रहे है .बाबा सियासत और कांग्रेस की चाल से पूरी तरह वाकिफ है .
लेकिन सवाल यह है देश के संसद से महज ५०० मीटर की दुरी पर स्थित जंतर मंतर पर कुछ एन जी ओ के  अनसन से सरकार इतना क्यों विचलित हो उठती है कि कानून बनाने का जिम्मा सांसदों से छीन कर एन जी ओ वाले को दे दिया जाता है .कलाधन के मामले में सरकार संसद में चर्चा से बचती है लेकिन बाबा रामदेव से इसी मुद्दे पर चर्चा के लिए ऐयेरपोर्ट पर दौर लगाती है .सरकार इखलाख से चलती है, सरकार भरोसे से चलती है, सरकार लोगों से संवाद बना कर चलती है .अगर यह सरकार में नहीं है तो माना जायेगा कि यह सरकार किसी के लिए चलायी जा रही है जिसका देश से कोई संवाद नहीं कोई सरोकार नहीं  है .बाबा रामदेव के भारत स्वाभिमान परिषद् और सोनिया जी के राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् के बीच फसी यह सरकार को तय करना होगा कि वह किसके साथ है .